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चातुर्मास के साथ मांगलिक कार्यों पर लगेगा विराम

देवशयनी एकादशी के साथ भगवान विष्णु 119 दिनों के लिए योगनिद्रा में प्रवेश करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान 25 जुलाई से 20 नवंबर (देवप्रबोधिनी एकादशी) तक चातुर्मास रहेगा और विवाह सहित कई मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। इस अवसर पर देशभर के विष्णु और विठ्ठल मंदिरों में विशेष पूजा, अभिषेक और शयन आरती का आयोजन किया जाएगा।




देवशयनी एकादशी का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और इस दौरान सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। चातुर्मास समाप्त होने पर देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत होते हैं।

इसी अवधि में श्रावण मास, रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, श्राद्ध पक्ष, शारदीय नवरात्र, शरद पूर्णिमा और दीपावली जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं।

मंदिरों में होंगे विशेष आयोजन
देवशयनी एकादशी पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त से भगवान विष्णु का अभिषेक और विशेष पूजन किया जाएगा। शाम को शयन आरती के साथ भगवान को योगनिद्रा के लिए शयन कराया जाएगा। चातुर्मास के दौरान कई स्थानों पर धार्मिक प्रवचन, कथा, भजन-कीर्तन और विभिन्न आध्यात्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाएंगे।

इंदौर में निकलेगी दिंडी यात्रा
देवशयनी एकादशी के अवसर पर इंदौर में सर्व मराठी भाषी संघ की ओर से पारंपरिक दिंडी यात्रा निकाली जाएगी। यह यात्रा शाम 5:30 बजे राजवाड़ा से शुरू होकर ऐतिहासिक पंढरीनाथ मंदिर पहुंचेगी। इसमें श्रद्धालु भगवा ध्वज, पारंपरिक मराठी वेशभूषा, टाल-मृदंग, संतों के अभंग और सिर पर तुलसी वृंदावन धारण कर शामिल होंगे। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए 300 किलोग्राम खिचड़ी महाप्रसाद का वितरण भी किया जाएगा।

पंढरीनाथ मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
इंदौर का होलकरकालीन पंढरीनाथ मंदिर शहर की प्रमुख धार्मिक धरोहरों में शामिल है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, इसका निर्माण 1811 से 1833 के बीच महाराजा मल्हारराव होलकर द्वितीय के शासनकाल में कराया गया था। मंदिर में स्वयंभू काले पत्थर की भगवान विठ्ठल की प्रतिमा विराजमान है, जो मराठा-नागर स्थापत्य शैली का सुंदर उदाहरण मानी जाती है।

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