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NEET पेपर लीक मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

 NEET पेपर लीक मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
देश की सर्वोच्च अदालत ने नीट पेपर लीक मामले की सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और संबंधित अधिकारियों से कड़ी जवाबदेही की मांग की है। अदालत ने इस गंभीर विफलता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पूछा कि आखिर इतनी सिफारिशों के बावजूद पेपर लीक कैसे हुआ और इसकी सच्चाई क्या है? जस्टिस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने विशेष रूप से समिति के अध्यक्ष से यह जानना चाहा कि वे मूल रूप से विशेषज्ञ समिति के सदस्य थे, तो फिर कार्यान्वयन की निगरानी किस हद तक हुई और यह बड़ी विफलता आखिर क्यों हुई? सर्वोच्च अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि उच्च स्तरीय समिति (HPC) की सिफारिशों के आधार पर की गई निगरानी के बावजूद यह घटना घटित हुई है, तो इसका मतलब है कि या तो सिफारिशों में ही कोई मूलभूत समस्या थी, या फिर उन सिफारिशों पर ठीक से निगरानी की ही नहीं गई।




अदालत ने सॉलिसिटर जनरल (एसजी) मेहता से कहा कि यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और इसमें पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मुद्दे पर कोई भी ढिलाई स्वीकार्य नहीं है। सुनवाई के दौरान, डॉ. राधाकृष्णन ने अदालत को बताया कि उनकी समिति ने कुल 60 सुझाव दिए थे, जिनमें से अधिकांश को पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ सुझाव अभी भी प्रक्रियाधीन हैं। डॉ. राधाकृष्णन ने दावा किया कि 2025 में होने वाली नीट यूजी परीक्षा संतोषजनक ढंग से आयोजित की गई थी, केवल कुछ केंद्रों में बिजली गुल होने जैसी छोटी-मोटी घटनाएं ही सामने आईं। उनके अनुसार, अन्यथा सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया और परीक्षा सफल रही। उन्होंने एनटीए को और अधिक मजबूत करने की सिफारिश भी की थी।

जवाबदेही तय हुए बिना समाधान संभव नहीं: जस्टिस नरसिम्हा
डॉ. राधाकृष्णन ने आगे कहा कि इस बार का मुख्य सवाल प्रश्न पत्रों में हेराफेरी का था, जिसके लिए कई उपाय लागू किए जा चुके हैं। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि अगले महीने होने वाली री-नीट परीक्षा के लिए इन सभी पहलुओं का विशेष ध्यान रखा गया है। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने उनसे पूछा कि क्या समिति नियमित रूप से बैठकें करती है, जिसका जवाब उन्होंने ‘जी हां’ में दिया। जस्टिस नरसिम्हा ने जोर देकर कहा कि जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं हो जाती, तब तक असली समस्या का समाधान नहीं होगा।

सर्वोच्च अदालत ने इस दौरान संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की कार्यप्रणाली का उदाहरण दिया और कहा कि यूपीएससी की परीक्षाओं में कभी कोई समस्या नहीं रही है। अदालत ने एनटीए को यह बात समझने की सलाह दी। एसजी ने सरकार की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि वे युवाओं से जुड़े मामलों को देख रहे हैं और सरकार इस बारे में बेहद गंभीर है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री स्वयं इस पूरे मामले की निगरानी कर रहे हैं। इस पर सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की कि यदि ऐसा हो रहा है तो यह अत्यंत दुखद है। अदालत ने यह भी कहा कि हमारी अधिकांश संस्थाओं की समस्या ‘तदर्थवाद’ (ad hocism) है, जहां ज्ञान का प्रसार नहीं होता। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षमता व्यक्ति में नहीं, बल्कि संस्था में होनी चाहिए।

शिक्षा मंत्रालय से मांगा विस्तृत हलफनामा
जस्टिस नरसिम्हा ने अपने आदेश में दर्ज किया कि शिक्षा मंत्रालय (पूर्व में एचआरडी मंत्रालय) को एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा। इस हलफनामे में यह स्पष्ट रूप से बताया जाएगा कि भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया और उसका समापन कैसे और किस प्रकार किया जाएगा। इसमें विशेषज्ञ कर्मियों की नियुक्ति और संस्थागत विविधता के माध्यम से निरंतरता की संस्थागत स्मृति को कैसे स्थापित किया जाए, इसकी भी जानकारी देनी होगी। अदालत का मुख्य प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के पास 2024 या 2026 की परीक्षाओं को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए पर्याप्त भौतिक और बौद्धिक संसाधन उपलब्ध हों। यह हलफनामा 2 जुलाई से पहले दाखिल किया जाना अनिवार्य है।

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