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“संघ के सौ वर्ष” का भव्य विमोचन, राष्ट्रचेतना, तपस्या और संघर्ष की शताब्दी गाथा

 “संघ के सौ वर्ष” का भव्य विमोचन, राष्ट्रचेतना, तपस्या और संघर्ष की शताब्दी गाथा

इंदौर।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की राष्ट्रसेवा, सामाजिक समरसता और संगठनात्मक तपस्या को शब्दों में संजोती पुस्तक “संघ के सौ वर्ष” का भव्य विमोचन 30 जनवरी को नर्मदा साहित्य मंथन के गरिमामय मंच पर संपन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संघ चालक   पूर्णेन्दु सक्सेना के कर-कमलों से किया गया।

यह आयोजन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के खंडवा रोड स्थित तक्षशिला परिसर के सभागार में आयोजित तीन दिवसीय नर्मदा साहित्य मंथन के दूसरे दिन संपन्न हुआ। देशभर से पधारे साहित्यकारों, विचारकों एवं प्रबुद्धजनों की गरिमामय उपस्थिति ने इस अवसर को ऐतिहासिक बना दिया।



लेखिका एवं वरिष्ठ पत्रकार शीतल रॉय द्वारा लिखित पुस्तक “संघ के सौ वर्ष” केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा, संगठन निर्माण और ‘राष्ट्र हित सर्वोपरि’ की विचारधारा को स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विगत सौ वर्षों में किए गए संघर्ष, साधना और सेवा का सशक्त एवं जीवंत दस्तावेज़ है। पुस्तक में संघ की वैचारिक यात्रा, सामाजिक समरसता, सेवा कार्यों और राष्ट्रनिर्माण में उसके योगदान को तथ्यात्मक, शोधपरक एवं ओजस्वी शैली में प्रस्तुत किया गया है।


पुस्तक विमोचन अवसर पर उपस्थित वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए कहा कि “संघ के सौ वर्ष” आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध, वैचारिक प्रेरणा और संगठनात्मक चेतना का महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी।


नर्मदा साहित्य मंथन के मंच से हुआ यह विमोचन राष्ट्रवादी साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, जो समकालीन समाज को विचार, मूल्य और राष्ट्रधर्म से जोड़ने का कार्य करेगा।

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