निवेशक कितने भी हों षडयंत्र एक तो FIR भी एक ही काफी - सुप्रीम कोर्ट

 निवेशक कितने भी हों षडयंत्र एक तो FIR भी एक ही काफी - सुप्रीम कोर्ट 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है अगर एक ही षडयंत्र से बहुत अधिक लोगों के साथ अपराध हुआ हो तो ऐसे मामलों में एक सभी पीड़ितों की अलग-अलग FIR की आवश्यकता नहीं है। ऐसे मामलों में एक ही FIR काफी है। एक FIR दर्ज करके दूसरे पीड़ितों को 161 के बयानों के आधार पर उसी FIR में जोड़ लिया जाए।



दिल्ली हाइकोर्ट के पुराने फैसले को किया रद्द

यह निर्णय अदालत ने दिल्ली राज्य यानी NCT की अपील की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने अपील को स्वीकार कर लिया और कहा कि ऐसे मामलों में जहां एक ही आपराधिक साजिश रची गई हो और उसके कारण बड़ी संख्या में निवेशकों के साथ धोखाधड़ी हुई हो तो ऐसे मामलों में एक FIR दर्ज करना और दूसरी शिकायतों को आपराधिक प्रक्रिया संहिता ( CRPC ) की धारा 161 के तहत बयान के तौर पर मान लेना या केस डायरी में दर्ज कर देना ​​कानूनी तौर पर सही है। यह कहते हुए अदालत ने वर्ष 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें प्रत्येक निवेशक के लिए अलग-अलग FIR दर्ज करने की बात कही गई थी।


उदाहरण से समझिए इससे क्या होगा

उदाहर के तौर पर हम इस फैंसले को इस तरह से समझते हैं कि, एक कॉलोनाइजर ने एक हजार फ्लैट बनाने की बात कही और एक हजार लोगों से इसके लिए एडवांस रकम ले ली। बाद में यह कॉलोनी डवलप नहीं हुई या कॉलोनाइजर ने निवेशकों के साथ कोई फ्रॉड कर दिया तो ऐसे मामलों में एक हजार FIR दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होगी। एक ही FIR में सभी एक हजार लोगों के बयान दर्ज कर लिए जाएंगे और उन्हे एक तरह से मुख्य आरोप के सपोर्ट में रखा जाएगा। ऐसे लोग आरोप को सिद्ध करने के लिए गवाह बनेंगे। अदालत ने कहा कि अगर एक ही FIR में बाकी लोगों को गवाह के रूप में जोड़ लिया जाएगा तो इससे अपराध की प्रवृत्ति कम न हीं होगी और ना ही इससे दंड के प्राविधान पर कोई असर पड़ेगा। इसलिए एक ही FIR पर्याप्त है।


ये है पूरा मामला

लाइव-लॉ के अनुसार, यह आदेश जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने दिया है। बेंच के समक्ष राज्य दिल्ली ( NCT ) की ओर से एक अपील दायर की गई। इस अपील को बेंच ने मंजूरी दे दी। यह अपील इस प्रकार थी कि, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 2009 में एक FIR दर्ज की। इस FIR में आरोप थे कि, अशोक जडेजा और उसके साथियों जिनमें खिमजी भाई जडेजा भी शामिल हैं, मिलकर निवेशकों से कहा कि आपके पैसे तीन गुना कर देंगे और इस तरह एक झूठा प्रलोभन देकर करीब 1 हजार 852 निवेशकों से कथित तौर पर लगभग 46.40 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। इस मामले में एक ही FIR दई की गई। बाकी निवेशकों की शिकायतों को बयान के तौर पर मानते हुए केस डायरी में जोड़ लिया गया। इस मामले में जब आरोपी पक्ष की ओर से जमानत की अर्जी दी गई तो ट्रायल कोर्ट ने CRPC की धारा 395 (2) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट को दो सवाल भेजे। इन सवालों में पूछा गया कि, क्या हर जमा एक अलग लेन-देन है जिसके लिए अलग FIR और चार्जशीट की ज़रूरत है। दूसरे सवाल में पूछा गया कि, क्या सभी मामलों को एक साथ मिलाने से सजा कम हो जाएगी ? दिल्ली हाईकोर्ट ने इनके जवाब में लिखा कि, एक आपराधिक साज़िश के तहत बड़ी संख्या में निवेशकों या जमाकर्ताओं को लुभाने और धोखा देने के मामले में हरेक निवेशक का अलग और व्यक्तिगत लेन-देन है। ऐसे सभी लेन-देन को एक निवेशक की शिकायत में रखकर दूसरे पीड़ितों को गवाह दिखाकर एक ही FIR में नहीं मिलाया जा सकता। दूसरे सवाल के जवाब में दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि, हर FIR के संबंध में एक अलग फाइनल रिपोर्ट फाइल करनी होगी। अलग-अलग FIR के संबंध में फाइल की गई फाइनल रिपोर्ट को मिलाने का कोई सवाल ही नहीं है। CRPC की धारा 219 के अनुसार फाइनल रिपोर्ट को मिलाने पर कोर्ट यानी मजिस्ट्रेट तय करेंगे और इसी दौरान विचार होगा।

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